मशरूम की खेती कैसे शुरू करें? | Mushroom Farming Business 2022

मशरूम की खेती अधिक मुनाफ़ा देने वाले कृषि-व्यवसायों में से एक है जिसे कोई भी किसान कम निवेश और कम जगह के साथ शुरू कर सकते हैं।

अगर बात करें तो दुनिया भर में, अमेरिका, चीन, इटली और नीदरलैंड मशरूम के शीर्ष उत्पादक देश हैं। भारत में देखा जाये तो, उत्तर प्रदेश में मशरूम का उत्पादन भारी मात्रा में होता है और देश में यह मशरूम का प्रमुख उत्पादक है, इसके बाद त्रिपुरा और केरल आते हैं। हमारे देश में मशरूम की खेती कई लोगों की आय के वैकल्पिक स्रोत के रूप में धीरे-धीरे अपना स्थान बना रही है।

अगर आप कोई कृषि-आधारित व्यवसाय करने की सोच रहें है तो मशरूम का व्यापार (Mushroom Farming Business) आपके लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकता है। जिसे आप सिर्फ एक छोटे से कमरे से शुरू कर अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं। तो चलिए देखते है मशरूम की खेती कैसे करते हैं, इस व्यापार को शुरू करने में लागत कितनी आती है और इसमें लाभ कितना होता है।

मशरूम के प्रकार

दुनिया में मशरूम के 10,000 से अधिक ज्ञात प्रकार हैं हालांकि इसमें जंगली और खाने योग्य मशरूम दोनों शामिल है। अगर सिर्फ खाने योग्य मशरूम की बात की जाये तो भारत में मुख्यतः 3 प्रकार के मशरूम की डिमांड बाजार में सबसे ज़्यादा है, और उनके नाम है:

  1. बटन मशरूम (Button Mushroom)
  2. ढिंगरी या ओएस्टर मशरूम (Oyster Mushroom)
  3. मिल्की मशरूम (Milky Mushroom)

अगर आप बिजनेस के नज़रिये से देख रहें हैं तो आप इन्ही तीन प्रकार में से किसी एक को चुनकर अपनी शुरुआत कर सकते हैं।

मशरूम की खेती के लिए कितनी जगह होनी चाहिए

इसकी खेती आप अपने घर से ही शुरू कर सकते हैं, आपको सिर्फ एक 6×10 या फिर 10×10 का कमरा चाहिए होगा। जहां पर सूरज की किरणे प्रवेश न कर सके क्यूंकि इससे मशरूम की उपज ख़राब होने का डर बना रहता है। इसके साथ ही कमरे में एक खिड़की होनी भी आवश्यक है जिससे हवा का प्रवाह होता रहे, मगर इसे हमेशा खुला रखना नहीं होता है।

अगर आप कम पूंजी लगाकर मशरूम का व्यापार करने की सोच रहें है तो आप इसे किसी खेत में भी कर सकते हैं। उसके लिए आपको उस खेत में झोपड़ी बनाना होगा, जिसकी लम्बाई 50 से 70 फीट और चौड़ाई 10 फिट हो। उसे अच्छी तरह से ढकना होगा ताकि सूरज की किरणे उसमे प्रवेश न कर पाए। यह तरीका कम खर्चीला है और एक बार बनने के बाद ये झोपड़ीनुमा ढांचा लगभग 5 सालों तक आसानी से चल सकता है।

ऑयस्टर मशरूम उगाने की पूरी जानकारी (Oyster mushroom farming process)

oyster mushroom ki farming
Oyster Mushroom

ऑयस्टर मशरूम में दूसरे मशरूम की तुलना में औषधीय गुण ज़्यादा मात्रा में पाये जाते हैं और इसका उत्पादन करना भी काफी सस्ता पड़ता है। अगर आप पहली बार मशरूम की खेती करने जा रहें है तो ऑयस्टर (ढिंगरी) मशरूम आपके लिए सबसे सही विकल्प साबित हो सकता है। अगर डिमांड की बात की जाये तो इसकी मांग महानगरों में सबसे ज़्यादा है चाहे वो दिल्ली, मुंबई हो या फिर चेन्नई, ये काफी तेज़ी से बिकते है।

इस मशरुम की सबसे ख़ास बात यह है कि इसे आप सालो भर उगा सकते हैं, आपको बस तापमान 20 से 30°C रहे इसका ध्यान रखना पड़ता है।

ऑयस्टर मशरूम की मुख्यतः 3 प्रजातियां पायी जाती है जो निम्नलिखित है;

1. प्लूरोटस सिट्रीनोपिलेटस (P.C.) – इसे उगाने के लिए 22-35°C का तापमान होना आवश्यक है
2. प्लूरोटस साजरकाजू (P.503) – इसे उगाने के लिए 22-30°C का तापमान होना आवश्यक है
3. प्लूरोटस फ्लोरिडा (P.F.) – इसे उगाने के लिए 18-25°C का तापमान होना आवश्यक है

ऑयस्टर मशरूम की खेती करने के लिए सबसे पहले आपको मशरूम का बीज चाहिए होगा, जिसे किसान स्पॉन (Mushroom Spawn) के नाम से जानते हैं।

ध्यान रखें, जब भी आप मशरूम की बुवाई करने जा रहे हो उसके हफ्ते भर पहले ही स्पॉन की खरीदारी करें, ये नहीं की आप महीने भर पहले से बीज खरीद कर रख लें। मशरुम के बीज की शेल्फ लाइफ ज़्यादा नहीं होती इसलिए ये बहुत जल्दी ख़राब हो जाते है, इसलिए उगाने के 5-7 दिन पहले ही स्पॉन लेकर रखें।

ऑयस्टर मशरूम कम्पोस्ट तैयार करने के लिए ज़रूरी सामग्रियां:

भूसा, स्पॉन, पानी की टंकी (1000 लीटर), पॉलीबैग (प्लास्टिक का थैला), फार्मेलिन, और बाविस्टीन।

उत्पादन विधि (Preparation):

1. भूसा तैयार करना

सबसे पहले 1000 लीटर पानी की टंकी में 950 लीटर पानी भर देंगे, पानी को पूरा नहीं भरना है क्योंकि भूसे को फुलने के लिए जगह की आवश्यकता होती है। इसलिए 1000 लीटर टंकी में सिर्फ 950 लीटर ही पानी भरेंगे।

इसके बाद इस पानी में 1140 मिलीलीटर फार्मेलिन का घोल मिलाएंगे, आमतौर पर फॉर्मेलिन का अनुपात 100 लीटर पानी में 120 ml का होता है, इसलिये, 950 लीटर पानी में फार्मेलिन का अनुपात लगभग 1140 ml होगा।

ये करने के बाद पानी में बाविस्टीन मिलाएंगे, बाविस्टीन डालने का उद्देश्य है: अवांछित फंगस और परजीवी अगर पानी में उपस्थित है तो वो मर जाएँ। इसका अनुपात 100 लीटर पानी में लगभग 10 ग्राम का होता है तो, 950 लीटर के हिसाब से 95 से लेकर 100 ग्राम तक मिला देंगे।

इस स्टेप के बाद पानी को अच्छे से मिला लेंगे ताकि फार्मेलिन और बाविस्टीन अच्छी तरह से पानी में घुल जाए।

उसके बाद इस पानी में हम 10% के हिसाब से भूसा मिलाएंगे, तो 950 लीटर पानी में लगभग 95 kg गेहूं का भूसा (Wheat straw) शामिल करेंगे। यह हो जाने के बाद टंकी/ड्रम का ढक्कन लगाकर अच्छे से बंद कर दे ताकि अंदर की गैस बाहर न निकल पाए, और फार्मेलिन अच्छी तरह से कम्पोस्ट को बना सके। इस मिश्रण को कम से कम 18 घंटे तक ड्रम के अंदर भीगने के छोड़ दें।

2. स्पॉन मिश्रण और मशरूम बैग बनाने की प्रक्रिया

यह प्रक्रिया हो जाने के बाद मिश्रण को एक जूट के बोरे में खाली कर लें। बोरे में खाली करने से अतिरिक्त पानी और नमी निकल जाएगी जिससे आगे के स्टेप्स में आपको आसानी होगी।

इसके बाद किसी ऐसी जगह जहाँ सीधे सूरज की किरणे न आती हो वहां पर एक कपड़े का तिरपाल बिछाये, अगर आपके पास प्लास्टिक का तिरपाल है तो वो भी इस्तेमाल कर सकते हैं। उसपर इस भूसे को मिश्रण को बराबर भाग में बिछा दें और इसके तब तक सूखने दें जब तक इस भूसे की नमी 60-65% तक न हो जाये।

इसे चेक करने का सबसे आसान तरीका है: हाथ में भूसे को लेकर दबाएं, अगर हाथ में बस नमी रह जाए और पानी की बूंदे न गिरे तो समझ जाएं यह मिश्रण स्पॉन (मशरूम के बीज) डालने के लिए तैयार है।

सामान्यतः स्पॉन (मशरूम के बीज) डालने का अनुपान 10% होता है: अगर आप 100kg गेहूं का भूसा इस्तेमाल कर रहें है तो इसमें 10kg स्पॉन ज़रुरत होगी।

गेहूं के भूसे के मिश्रण में स्पॉन को अच्छे से मिला लें और इसे 5 से 10 kg की प्लास्टिक की थैलियों में अच्छे से भर दें, मगर ध्यान रखें कोई एयर गैप न रह जाए। इसलिए बैग में मिश्रण को लेयर के हिसाब से धीरे-धीरे भरें। एक बार भर जाने के बाद उस थैले को अच्छे से रबर बैंड या फिर धागे की सहायता से बंद कर दे और उसमें 8-10 छेद भी कर दे।

यह प्रक्रिया हो जाने के बाद इन प्लास्टिक के थैलों को एक अँधेरे कमरे को रख दें, जहां पर हवा का प्रवाह न होता हो। क्योंकि, इसके बाद कवक जाल फैलने (mycelium run) की शुरूआत होती है जिसके लिए कमरे में अँधेरा होना ज़रूरी होता है और कमरे का तापमान 22-25°C और नमी 70-90% के बीच होना चाहिए।

लगभग 15-20 दिनों के बाद आपको प्लास्टिक के थैलों पर पिनहेड (Mushroom Pinhead) दिखने शुरू हो जायेंगे। फिर 3 से 5 दिनों के अंदर ओएस्टर मशरुम तोड़ने के लिए तैयार हो जायेंगे।

बटन मशरूम उगाने की पूरी जानकारी (White Button mushroom farming process)

button mushroom farming kaise kare
Button Mushroom

सफेद बटन मशरूम को भी बड़े चाव से खाया जाता है और यह फाइबर, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट का एक समृद्ध, कम कैलोरी वाला स्रोत हैं। इसे उगाने के लिए धूप की आवश्यकता नहीं होती है ये अँधेरे वाली जगह पर उगते हैं। इस मशरूम की प्रजाति को वर्ष के किसी भी समय लगाया जा सकता है, मगर सर्दियों का मौसम इसके लिए सबसे बेहतर होता है, जब बाहर सब कुछ ठंडा और धूमिल होता है, तो यह बड़ी तेजी से बढ़ता है।

शुरूआती दिनों में इसे उगने के लिए कमरे का तापमान 20-28°C और फल आने के बाद 12-18°C होना चाहिए। इसके साथ ही कमरे में आर्द्रता लगभग 80-90% होनी चाहिए।

आमतौर पर बटन मशरुम की खेती पहाड़ी इलाको में ज़्यादा होती है, मगर खेती के आधुनिकीकरण के बाद इसे अब भारत में कहीं भी लगाया जा सकता है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और बिहार। मैदानी इलाकों जैसे बिहार और महाराष्ट्र में इसकी खेती अक्टूबर से लेकर फ़रवरी तक की जा सकती है।

सफ़ेद बटन मशरूम को उगने के लिए मुख्यतः 3 चीज़ों की आवश्यकता पड़ती है: कम्पोस्ट, स्पॉन और केसिंग मिट्टी।

जिस खाद पर बटन मशरूम उगता है, वह प्रमुख रूप से पौधों के अपशिष्ट जैसे पुआल, गेहूं का भूसा, गन्ने की खोई, इत्यादि के मिश्रण से बना होता है।

कम्पोस्ट को दो विधि द्वारा बनाया जा सकता है: पाइप विधि और साधारण विधि।

अगर आप पाइप विधि से कम्पोस्ट बनाते है तो इसमें लगभग 14 दिनों का समय लगता है, इसमें संसाधन और खर्च ज़्यादा लगता है। इसके विपरीत अगर साधारण विधि से खाद तैयार करते हैं तो लगभग 28 से लेकर 30 दिनों तक का समय लग सकता है मगर ये कम खर्चीला है।

इस आर्टिकल में हम सामान्य विधि से कम्पोस्ट खाद बनाने की प्रक्रिया सीखेंगे।

बटन मशरूम कम्पोस्ट तैयार करने के लिए ज़रूरी सामग्रियां:

  • गेहूं या धान का भूसा (10-12 cm लम्बाई में कटा हुआ): 250kg
  • गेहूं का चोकर: 25kg
  • कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट: 5kg
  • यूरिया: 3kg
  • जिप्सम: 25kg

उत्पादन विधि:

1. कम्पोस्ट बनाना

सबसे पहले गेहूं या धान के भूसे को किसी समतल जगह पर बिछा लें और उसे पूरी तरह से गिला कर दें। इस प्रक्रिया को पहले 2 दिनों तक करना होता है। फिर तीसरे दिन (3rd Day)इसमें यूरिया, गेहूं का चोकर, कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट पूरी तरह से मिलाकर एक ढेर बना लें और लगभग दो दिनों तक इस मिश्रण को ऐसे ही छोड़ दें।

फिर छठवें दिन (6th Day) इसकी पहली पलटाई करते हैं, इसमें बाहर के लगभग 6 इंच तक भूसे की परत को कुदाल की सहायता से तोड़ते है और अंदर का भाग बाहर और बाहर का भाग अंदर कर देते है। ये प्रक्रिया हर 2 दिनों में दोहराई जाती है, जब तक 8 पलटाई न हो जाये। दसवें दिन (10th Day) तीसरी पलटाई का समय आ जाने पर उसमें पूरा जिप्सम मिला दें और खाद में पानी की मात्रा जांच लें अगर कम है तो आवश्यकता अनुसार मिलाएं, हालांकि, ये काम जिप्सम मिलाने के पहले करें।

(नोट: पानी की मात्रा सही है या नहीं ये देखने के लिए पाम टेस्ट/हथेली में खाद दबाकर देखते हैं की पानी आ रहा है या नहीं, अगर हथेली से पानी नहीं गिर रहा तो इसमें आवश्यकतानुसार पानी मिला लें।)

कम्पोस्ट के तैयार हो जाने पर इसका रंग गहरा भूरा हो जाता है और इसमें से अमोनिया की गंध भी नहीं आती है। अगर फिर भी अमोनिया की गंध आती है तो इसकी एक से दो पलटाई और कर दें।

उत्तम कम्पोस्ट का pH मान 7-7.8 के बीच होना चाहिए और इसमें नमी की मात्रा 60-65% तक होनी ज़रूरी है।

2. स्पॉनिंग और बेड बनाना

यह प्रक्रिया हो जाने के बाद इस कम्पोस्ट खाद को ठंडा कर लेंगे, इस खाद का तापमान लगभग 25°C तक होना चाहिए उसके बाद ही स्पॉनिंग (बीज डालना) शुरू करेंगे। इसके बाद इस कम्पोस्ट में 1 प्रतिशत की दर से मशरूम के बीज (Mushroom Spawn) मिला देंगे, यहाँ हमने 250 किलो कम्पोस्ट से शुरुआत किया था जो कि बनने के बाद करीब 500 किलोग्राम तक हो जाता है। तो इसमें हम लगभग 5kg स्पॉन मिला देंगे और इसे प्लास्टिक की थैलियों या फिर बेड (पेटियां) में भर देंगे और ऊपर से अख़बार से ढक देंगे।

ध्यान रखें: अगर आप बेड (पेटी) का इस्तेमाल कर रहें है तो इसकी ऊंचाई 8-10 इंच होनी चाहिए और अगर प्लास्टिक के बैग का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसकी ऊंचाई 10 से 12 इंच तक।

आप जिस भी कमरे में इन बेड को बना कर रखें वहां पर 15 दिनों तक कार्बन डाइआक्साइड (CO2) कंसंट्रेशन ज़्यादा रखे और ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम। अगर आप प्लास्टिक की थैलियों में मिश्रण रख रहें है तो उसे ऊपर से बंद कर दें। 15 दिनों के बाद स्पॉन रन खत्म हो जाता है और कवक जाल फैलना शुरू हो जाता है। उस समय इसमें 1.5 इंच ऊँची केसिंग मिट्टी की एक परत चढ़ाई जाती है और पानी का छिड़काव किया जाता है। केसिंग मिट्टी डालने के बाद कमरे के अंदर ताज़ी हवा का प्रवाह बराबर रूप से होना चाहिए और ऑक्सीजन की भरपूर मात्रा होनी चाहिए।

लगभग एक हफ्ते के बाद उस मिट्टी में छोटी-छोटी मशरूम निकलनी शुरू हो जाती है जिसे आम भाषा में पिनहेड (Mushroom Pinhead) कहा जाता है। और उसके करीब 5 से 7 दिनों के बाद मशरूम तोड़ने के लायक हो जाते है। इसमें फसल लगभग 3 महीने तक बराबर आती रहती है, आपको सिर्फ इसमें पानी देने की आवश्यकता होती है।

FAQ:

प्रश्न. मशरूम की खेती में कितनी लागत आती है?
उत्तर: कम लागत लगाकर ज़्यादा कमाई करने के लिए मशरुम की खेती बिलकुल उपयुक्त है। इसकी खेती के लिए बड़ी पूंजी लगाने की आवश्यकता भी नहीं होती, आप सिर्फ 50 हज़ार से 1 लाख रूपए तक खर्च कर सालभर में 3-4 लाख रुपए तक का अच्छा मुनाफा बना सकते हैं।

प्रश्न. मशरूम का बीज कितने रुपए किलो मिलता है?
उत्तर: मशरूम के बीज की कीमत लगभग 90-100 रुपए प्रति किलोग्राम है, हालांकि ये दाम मशरूम के किस्म पर निर्भर करती है।

प्रश्न. मशरूम का बीज कहाँ से मिलेगा?
उत्तर: इसके लिए आपको ज़्यादा भटकने की आवश्यकता नहीं है, आप मशरूम के बीज को अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर ले सकते है। यह बीज आप खेती करने के 5-7 दिन पहले खरीदे क्यूंकि इनकी शेल्फ-लाइफ ज़्यादा नहीं होती और ख़राब होने का डर बना रहता है।

प्रश्न. मशरूम की खेती के लिए लोन कैसे मिलेगा?
उत्तर: मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा बहुत सारे लोन की स्कीम लायी गयी है। यह लोन नाबार्ड (NABARD) के माध्यम से दिया जाता है, इसके लिए आपको एक अच्छा बिज़नेस प्लान बनाकर सम्बंधित सरकारी कार्यालय जाना होगा। अगर आप सामान्य जाति (General Caste) के किसान हैं तो आपको 70 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी, और ST/SC किसानों को 90 प्रतिशत की सब्सिडी मिलेगी।

योजना के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए https://www.nabard.org पर जाएं।

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